Tuesday, 7 May 2024

ऊँगली पर सियाही -सतपाल ख़याल

ऊँगली पर सियाही 
लगाओ 
फिर  
दिल्ली की तरफ़ पीठ 
और आसमान की तरफ़ 
हाथ उठा कर, 
अगरबत्ती जला कर
बैठ जाओ |


Monday, 6 May 2024

सियासत की चिल्म

सियासत की चिल्म
भरता है कानून
और न्याय, आँख पर पट्टी बाँध कर
सियासती जूतों के फीते बाँधता है, जनाब
दुबक पर बैठ जाओ घर पर
कल सुबह काम पर भी तो जाना है

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बाप को चाकलेट देकर
जागिंग के लिए भेजती
और सीटी बजाकर
किसी लड़के को पास बुलाती
भारतीय युवा पीड़ी की प्रतीक
एक लड़की
लाइफ़ के मज़े लेती है।
कुछ भी खरीदो
बस..मज़ा लो
बनियान, परफ़्यूम, टुथपेस्ट, पान मसाला....

बाज़ार दीमक की तरह
चाट रहा है
मध्यम वर्ग को और
लूट रहा है हमारी संस्कृति
हमारे पारिवारिक मूल्य
हमारे घर
और हम
परिवार सहित देखते हैं
टेलिवीज़न

कल इक पत्ता बोला मुझसे


मैं शाखों से जुड़ा हुआ हूँ
लेकिन तुम अपने जीवन से
जुड़े नहीं हो
पकड़ रखा है जीवन तुमने
डर-डर कर तुम सारा जीवन खो देते हो
जैसा तुमको होना चाहिए
कब होते है
विरह में तुम गीत वस्ल के गाते हो
और मिलन में यही सोचते रहते हो
कल बिछुड़ेंगे

मुझको देखो
जैसा होना चाहिए बिल्कुल वैसा हूँ
घाम-शीत सब सहता हूँ
चुप रहता हूँ
तेरे जैसे तीन पड़ाव पार करूँगा
हाँ ! मैं भी तेरे जैसे इक दिन
मर जाऊँगा
लेकिन तेरी तरह मेरा नाम नहीं है
ज़ात नहीं है, धर्म नहीं है
कोई वेद-कुरआन नहीं है
तुम में केवल एक खोट है
जो मिलता है तुमको वो स्वीकार नहीं है
सुख है तो संतोष नहीं है
दुख में तो तुम मर जाते है
जैसा होना चाहिए
बोलो,
कब होते हो
मेरी तरह केवल होना सीखो तुम
तेरा होना, होना न होकर, विद्रोह है बस
बस आगे को इक अंधी सी दौड़ है बस
कैसे होना है बस तुम सीखो मुझसे
मेरा केवल होना ही है योग मेरा
केवल होना ही है वेद-कुरान मेरा
केवल होने की युक्ति मुझसे सीखो
मेरा होना बोझ नहीं है
मेरे होने पर भी संकट आता है
लेकिन मेरा होना केवल होना है
विद्रोह नहीं है
सच पूछो तो ज़ात-मज़हब जंज़ीर है बस
और जिसको तुम ईश्वर कहते हो
वो कुछ और नहीं है
वो भी केवल होना है
लेकिन होना सरल बहुत है
इसमें ही कठिनाई है
तुमको उलझी बातों में रस आता है
क्यों है? कब से? क्योंकर है
ये धर्म है तेरा
तुमने केवल होने का रस चखा नहीं है
शायद इसीलिए ही अब
दुख के सिवा कुछ बचा नहीं है
न तुम देखने वाले हो और न हीं
तुम कोई मंज़र हो
बस तुम हो...
यही होना तुम्हारी नियति है
इस होने में रत्ति भर भी दुख ही नहीं है
सच पूछो तो सुख भी नहीं
केवल होना ही आनंद है बस
उत्सव है बस केवल होना॥

लाजिकल

 मशीनें लाजिकल होती हैं

किसी फल का टूटकर जमीन पे गिरना
लाजिकल होता है

लाजिकल होते हैं रात और दिन
सर्दी गर्मी सब लाजिकल हैं

हाँ लेकिन सपने लाजिकल नहीं होते
न खुली आँख के
और न ही बंद आँखों के

उबाल

 

भला क्या लेना है मजदूर को लेनिन से
उसे तो दिहाड़ी से मतलब है
लेकिन मांसखोर मुंह देखता है वहीं
कि खून-पसीने से कमाये चंद सिक्कों के ढेर पर
कैसे मारी जाए ठुंग/
विकास तो मिट्टी देती है
एक दाने पर बैंकों की तरह भीख
जैसे ५% सूद समेत नहीं लौटाती
बल्कि एक दाने के बदले
गरीब की कोठरी भर देती है/
और यही कुदरत
छीनती है जून में गरीब के बदन से नमक
लौटा भी देती है सावन में /
पर तुम्हारी हथेली से पैसा छीनने वाले
शाकाहारी शब्
तुम्हें भेड़ की तरह छीलते और छांटते हैं
फिर मुस्कराते हुए
उम्मीद की मारी भेड़ों में कंबल बांटते हैं।

हे वीर सुनो !


धर धीर सुनो !
मैं कृष्ण
समक्ष खड़ा हूँ ,सुनो !
दुविधा में व्यर्थ समय न करो
उठ जाओ प्रिय ,इतना न डरो
तुम आये हो रणभूमि में
अब उठकर सीना तान लड़ो
हे वीर सुनो !
ये सब के सब हैं काल ग्रास
मत सोच अधिक ,मत हो उदास
पल पल ये जीवन रीत रहा
सब बीत रहा , अब आगे बढ़ो !
हे वीर सुनो !
तुम भाग के जाओगे भी जहां
ये पाप प्रपंच मिलेगा वहां
इस झूठे पापी लश्कर से
जैसे भी बने , हिम्मत से भिड़ो
हे वीर सुनो !
क्या होगा ,क्या न होगा , कल
इस सोच से अब बाहर तू निकल
मैं सत का सारथी युग-युग से
मैं श्री हूँ ,साथ हूँ ,विजयी बनो !
हे वीर सुनो !
रणधीर सुनो !
मैं कृष्ण
समक्ष खड़ा हूँ , सुनो !

निर्लज्ज व्यवस्था

निर्लज्ज व्यवस्था की
जिस पुष्ट शाख़ पर
झूला था तुम्हारा
शव/

रात
उस पेड़ की
फुनगी पर
सत्ता के वैभव का
पूर्ण चाँद
खिला था /
न्याय के किसी सूर्य की
एक भी किरण
तुम्हारे शव से नहीं टकराई
अपितु सूर्य ने पोषित
किया इस दंभी पेड़ के
हर पत्ते को /
गुलाबी अखबार
काले सूट
सब मौन थे/
कोई नहीं रोया
तुम्हारी
लुटी हुई अज़मत पर
तुम्हारे पिता के सिवा /
जिस शाख़ पर
फंदा था
उस शाख़ पर
कोंपलें फूटीं
पत्ते चमके
फूल खिले /
रंगीन पर्दे पर
भाषण हुए
तुम्हारी जात
तुम्हारे धर्म
तुम्हारे नाम की चर्चा की
भांडों ने
बस... /

"केंचुए "


चुप-चाप
लाशों की तरह
कंकरीट के जंगलों में
गमलों में फूल लगा कर
मस्त रहते हैं /
रेंगने के
क़िस्से सुनते हैं
केंचुए,
फिर खुश होते हैं
धीमे-धीमे
रेंग कर/
इनकी नसें
ठंडे खून से
भरी रहती हैं ,
आप इन्हें कुचल दें
मार दें
गाली दे दें
ठोकर में रखें
जलील करें
ये शांत रहते हैं /
इनके आस-पास
कोई है ही
नहीं
जो चलता हो
सर उठा कर /
हरे ,लाल ,सफेद नीले
रंग –बिरंगे
रीढ़ विहीन केंचुए
मिटटी चाट कर
मिटटी होते केंचुए
कितने मुफ़ीद हैं
किसी भी राजा के लिए /

टनल में फंसे मज़दूर


टनल के अंतिम छोर पर प्रकाश ..
केवल मुहावरों में होता है ,
यथार्थ में तो
हर टनल के अंतिम छोर पर
होती है
एक और अंधेरी , लम्बी ..
टनल /
प्रकाश तो
किसी धनाढ्य सेठ की
तिजोरी में होता है,
मज़दूर की जेब में
टनल के मैले –कुचैले अँधेरे जैसी
एक दिन की दिहाड़ी होती है
१००-२०० रूपये बस /
टनल के अन्दर हों या बाहर
अँधेरे में रहते हैं मज़दूर ,
क्या निकाल पायेगी
सियासत की वर्टिकल ड्रिल
टनल के अन्दर और बाहर
फंसे मज़दूरों को ??

"नव निर्माण"


काम पर है
पैनी छैनियाँ
गढ़ रहीं
अपने आकाओं की
छवियाँ /
काम पर हैं हथोड़े
ध्वस्त करने में
वो गुम्बद
जो ख़िलाफ़ हैं
आकाओं के /
अतीत को खोदती
कुदालें
काम पर हैं /
बग़ावती शब्दों को
उगते ही
उखाड़ने में
व्यस्त हैं
खुरपियाँ /
खेत को खाने वाली
बाड़ को सींचने में
व्यस्त हैं
माली /
नव –निर्माण के लिए
काम पर हैं
सब औज़ार /

ज़हर


गिरिये
बार-बार,
उठिए
फिर चलिए/
चखिए ,
रोज़-रोज़ ज़हर,
मरिये रोज़-रोज़ ,
मर- मर के
फिर-फिर चखिए
ज़हर /
गिरना
उठना
चलना
रहेगा यूं ही /
रहेगा यूँ ही मरना
जब तक,
ज़हर है
जब तक
जीवन है /

मजदूर हो तुम


सुनो मित्र !
बीत गई है रात बहुत
तुम करवट बदल रहे हो क्यों?
निर्वाण, प्रेम और आत्म विकास
ये सब कैसा चिंतन है।
बुद्ध नहीं हो तुम
न ही तुम अवतार हो कोई
करना हो जिसे धर्म स्थापित।
न तुम कोई दार्शनिक हो
ढूँढ रहे कारण जो तुम सुख-दुख के।
मन-बुद्धि से परे है गर ईश्वर तो फिर
क्यों तुम चिंतन-मनन करो हो ईश्वर का।
बीत गई है रात बहुत
अब सो जाओ
क्यों तुम भूल गये हो कि मजदूर हो तुम
सीमेंट की बोरी की भाँति
ढोना है कल सुबह तुमको फिर सूरज
और बाबु की गाली सुनकर
जी-जी कहते रहना है
रोटी वेद-पुरान है प्यारे
और रोटी ईमान है प्यारे
बुद्ध की भाँति जीवन से तुम भाग नहीं सकते
क्यों है? क्या है?कब से है सब?
यह सब बातें छोड़ो और तुम सो जाओ
दुख को अंगीकार करो, स्वीकार करो
जैसे भी बन पाये तुम बस चलते रहना
सब कुछ सहकर और चुप रहकर,चलते रहना
जब तक देह यह खुद-ब-खुद न गिर जाये
बढ़ते रहना अपने पथ पर जैसे-तैसे
मत भूलो तुम योगी या कोई संत नहीं हो
मजदूर हो तुम।

एक मज़ाहिया नज़्म - पौं बाराँ


फूलत- फलत, हसत, नित गावत
चोरन की नित-नित पौं बाराँ

सब कोऊ बांटत मीठी गोली
मत पूछौ कित -कित पौं बाराँ

जोड़ि -जोड़ि घर भर लिओ चोरन
इन की तो उत -इत पौं बाराँ

बांटिह ज्ञान चोरी मत करिओ
इनके चरित ,गणित पौं बाराँ

इनको पाप-श्राप नाहिं लागै
मान -समान अमित पौं बाराँ

साध, गरीब सीधे तरु कटते
इनकी उत , न इत पौं बाराँ

कहें "ख़याल " चुप बैठो घर मै
कोरोन -चोरन नित पौं बाराँ

ग़रीब की मौत


कामगारों की
किसी मिल हादसे में मौत ,
अख़बार के लिए ख़बर,
टी वी के लिए ब्रेकिंग ,
प्रशासन के लिए लाल फीते वाली फ़ाइल ,
पुलिस के लिए एफ़ आई आर,
मिल मालिक के लिए
बेल होने तक की परेशानी ,
और मेरे लिए भी
एक नज़्म ,
मज़दूर के लिए मुआवज़ा
और बद-क़िस्मती ,
सोशल मिडिया के लिए
छोटा सा रिप का मैसेज
बस .....
हम हादसों को होनी
समझते हैं
जिसे टाला न जा सके
और मौत
वो भी ग़रीब की
किसी की आंख को
नम नहीं करती ,
सब बिज़ी हैं /

पेड़


बहुत कुछ
सिखाता है हमें ,
सब कुछ चुप -चाप
सहने का सलीक़ा
सिखाता है
पेड़ /
मौसमों से
लड़ता नहीं है
पेड़ ,
गालियां नहीं बकता
पागल हवाओं को,
गिरते हुए पत्तों को
निहारता है बस,
रोता नहीं है पेड़ ,
कोई मलाल नहीं
नियति से
न काल से,
सहना और
बने रहना ,
चुप रहना
यही करता है
पेड़ /
अंत तो
मिटटी ही है,
पत्तो का भी,
शाखों का भी
और मौसमों का भी
और पेड़ का भी /
यातना को सहने की
यात्रा है
जीवन ,
और यात्रा है
साधना की
चुप रहने की
सहने की
चलते रहने की/
नर्क में सलीक़े से
जीने की
कला है जीवन /
यातना की
ये यात्रा
मुश्किल है ,
लेकिन
सुकून इस बात का है
की अंत
निश्चित है
इस वेदना का
इस यातना का
और जीवन का
है न ख़ुशी की बात ?

आँखें : (नज़्म :सतपाल ख़याल )

 बेबस
मायूस
और बीमार
आँखें
इंतज़ार में हैं
कि कब
फ़ज़ा बदलेगी /

मुल्क की तामीर
करने वाली आँखों को
भेड़ों की तरह मत हांको
तिरंगे के रंग
इनमें भी वैसे ही चमकते हैं
जैसे तुम्हारी अवसरवादी
लोभी आँखों में
चमकते से दिखते हैं /
अब
ज़रा गंभीर हो जाओ
अवसरवादिता और लोभ
से ग्रस्त आँखों में
यथार्त का सुरमा डालो
और
नाउम्मीद आँखों को
सपनों के बजाए
काम दो /
अब तुम्हारी
पोशाकों के रंग
इन बेबस
आँखों में
चुभने लगे हैं /

उठो कर्मवीर


उठो ! मजदूर
जलते चराग़ों
शंखनादों से
अपना हिस्सा
मांगो /
भूख ,
बेकारी ,
बीमारी
के फंदे को
कसने मत दो
उठो !
इस मुल्क़ के
ख्वाबों की तामीर
तुम्हीं ने की है
सरका दो
बुनियाद के भारी पत्थर,
अगर तुम्हे
न मिले
तुम्हारे हिस्से की रौशनी ,
रौशनी की भीख
से बेहतर है
क्रांति की मशाल /
सुनो !
कर्मवीर
मैं भी ज़्यादा लिख नहीं
सकता
मेरी कलम पर भी
पहरा है
आने वाली ग़ुर्बत
की आहट
सुनो /
जागो !
उठो कर्मवीर !

चलते रहना


सांसों की अंतिम रेखा छूने से पहले
मरना मत
भय हो
क्रोध हो
मान हो, अपमान हो
रोग हो
शोक हो
ताप हो
संताप हो
टूट जाना
बिखरना मत
सांसों की अंतिम रेखा छूने से पहले
मरना मत /
बहते रहना
तेज़ धार में
तिनका बनके
जब तक खुद न पानी फैंके
किसी किनारे
डरना मत
सांसों की अंतिम रेखा छूने से पहले
मरना मत /
हो जाती है कभी अमावस
बरसों लम्बी
हो सकता है
निकले भी न
चांद कभी
रहे अंधेरा
सारा जीवन
हो सकता है
हाँ ! ऐसा भी हो सकता है
लेकिन
सांसों की अंतिम रेखा को
जिस दिन भी तुम छू जाओगे
निश्चित है की
ताप मिटेगा
संताप मिटेगा
रोग-शोक सब मिटटी
में मिल जायेंगे
मान-सम्मान
दौलत -शोहरत
इज्ज़त
सब कुछ
मिट जाने का नियम अटल है।
फिर क्यों मरना
क्यों डरना
रुकना क्यों
झुकना क्यों
जैसे तैसे
सब कुछ सह कर
चुप रहकर
चलते रहना
सांसों की अंतिम रेखा छूने से पहले
मरना मत
रुकना मत
चलते रहना .चलते रहना ..चलते रहना।

भ्रम - एक नज़्म


उधार की सोच
भीड़ में तब्दील होते
भेड़ों के जैसे लोग ,
किसी नुक्क्ड़ पे बैठे
मवालियों सी
सियासत /
पक्ष -विपक्ष
दांयें-बांये
राहों-चुराहों पर
सियासत की चैस पर
पियादोँ की तरह
बैठे लोग/
दुनिया की एक चौथाई
गरीब आबादी ,
ख़ुदकुशी करते किसान ,
करोड़ों की मलाई खाते
कॉरपोरेट ,
धर्म ,जाति ,गौत्र
छोटा -शहर
बड़ा शहर
भेस और भाषाओं
में बंटे
असभ्य लोग /
स्कूलों में पॉर्न -स्टार
हीरोइनों के गीतों पे थिरकता
बचपन ,
हॉस्पिटलों में
मरते बच्चे /
कॉपी -पेस्ट मैसज़
के जैसे फेक
अर्बन कालोनियों में बसे
मॉडर्न लोग ,
गंदे नालों पर
बसी बेबस
बीमार झुग्गियां /
अश्लीलता और फूहड़पने
से भरे ज़हन ,
फटी हुई जीन
पहने नशा करते
नौजवान /
दो जून रोटी के लिए
आफिस में बॉस के
जूते चाटते
क्लीन शेव
लोग /
वर्कर के जितनी
सैलरी पे काम करते
इंजीनियर ,
स्कूलों में
दो-दो हज़ार पे काम करती
पढ़ी-लिखी औरतें ,
और..
झूठी सुर्खियां बांटते
बिके हुए अखबार
किसी अभिनेता की तरह
अदाकारी करते
बेहूदा
तिलमिलाते
न्यूज़ ऐंकर ,
चौबीस घंटे
ये भ्रम फैला
रहे हैं कि
ऑल इज़ वैल /

  क्या ख़ुदा है ??   जो ये कहता है "ख़ुदा है " उस ने देखा ही   नहीं जो ये कहता है "नहीं है" उस ने खोजा भी नहीं ...