Monday, 6 May 2024

आँखें : (नज़्म :सतपाल ख़याल )

 बेबस
मायूस
और बीमार
आँखें
इंतज़ार में हैं
कि कब
फ़ज़ा बदलेगी /

मुल्क की तामीर
करने वाली आँखों को
भेड़ों की तरह मत हांको
तिरंगे के रंग
इनमें भी वैसे ही चमकते हैं
जैसे तुम्हारी अवसरवादी
लोभी आँखों में
चमकते से दिखते हैं /
अब
ज़रा गंभीर हो जाओ
अवसरवादिता और लोभ
से ग्रस्त आँखों में
यथार्त का सुरमा डालो
और
नाउम्मीद आँखों को
सपनों के बजाए
काम दो /
अब तुम्हारी
पोशाकों के रंग
इन बेबस
आँखों में
चुभने लगे हैं /

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