Monday, 6 May 2024

मजदूर हो तुम


सुनो मित्र !
बीत गई है रात बहुत
तुम करवट बदल रहे हो क्यों?
निर्वाण, प्रेम और आत्म विकास
ये सब कैसा चिंतन है।
बुद्ध नहीं हो तुम
न ही तुम अवतार हो कोई
करना हो जिसे धर्म स्थापित।
न तुम कोई दार्शनिक हो
ढूँढ रहे कारण जो तुम सुख-दुख के।
मन-बुद्धि से परे है गर ईश्वर तो फिर
क्यों तुम चिंतन-मनन करो हो ईश्वर का।
बीत गई है रात बहुत
अब सो जाओ
क्यों तुम भूल गये हो कि मजदूर हो तुम
सीमेंट की बोरी की भाँति
ढोना है कल सुबह तुमको फिर सूरज
और बाबु की गाली सुनकर
जी-जी कहते रहना है
रोटी वेद-पुरान है प्यारे
और रोटी ईमान है प्यारे
बुद्ध की भाँति जीवन से तुम भाग नहीं सकते
क्यों है? क्या है?कब से है सब?
यह सब बातें छोड़ो और तुम सो जाओ
दुख को अंगीकार करो, स्वीकार करो
जैसे भी बन पाये तुम बस चलते रहना
सब कुछ सहकर और चुप रहकर,चलते रहना
जब तक देह यह खुद-ब-खुद न गिर जाये
बढ़ते रहना अपने पथ पर जैसे-तैसे
मत भूलो तुम योगी या कोई संत नहीं हो
मजदूर हो तुम।

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