निर्लज्ज व्यवस्था की
जिस पुष्ट शाख़ पर
झूला था तुम्हारा
शव/
रात
उस पेड़ की
फुनगी पर
सत्ता के वैभव का
पूर्ण चाँद
खिला था /
न्याय के किसी सूर्य की
एक भी किरण
तुम्हारे शव से नहीं टकराई
अपितु सूर्य ने पोषित
किया इस दंभी पेड़ के
हर पत्ते को /
गुलाबी अखबार
काले सूट
सब मौन थे/
कोई नहीं रोया
तुम्हारी
लुटी हुई अज़मत पर
तुम्हारे पिता के सिवा /
जिस शाख़ पर
फंदा था
उस शाख़ पर
कोंपलें फूटीं
पत्ते चमके
फूल खिले /
रंगीन पर्दे पर
भाषण हुए
तुम्हारी जात
तुम्हारे धर्म
तुम्हारे नाम की चर्चा की
भांडों ने
बस... /
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