भूख ,
बेकारी ,
बीमारी
के फंदे को
कसने मत दो
उठो !
इस मुल्क़ के
ख्वाबों की तामीर
तुम्हीं ने की है
सरका दो
बुनियाद के भारी पत्थर,
अगर तुम्हे
न मिले
तुम्हारे हिस्से की रौशनी ,
रौशनी की भीख
से बेहतर है
क्रांति की मशाल /
सुनो !
कर्मवीर
मैं भी ज़्यादा लिख नहीं
सकता
मेरी कलम पर भी
पहरा है
आने वाली ग़ुर्बत
की आहट
सुनो /
जागो !
उठो कर्मवीर !
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