Monday, 6 May 2024

उठो कर्मवीर


उठो ! मजदूर
जलते चराग़ों
शंखनादों से
अपना हिस्सा
मांगो /
भूख ,
बेकारी ,
बीमारी
के फंदे को
कसने मत दो
उठो !
इस मुल्क़ के
ख्वाबों की तामीर
तुम्हीं ने की है
सरका दो
बुनियाद के भारी पत्थर,
अगर तुम्हे
न मिले
तुम्हारे हिस्से की रौशनी ,
रौशनी की भीख
से बेहतर है
क्रांति की मशाल /
सुनो !
कर्मवीर
मैं भी ज़्यादा लिख नहीं
सकता
मेरी कलम पर भी
पहरा है
आने वाली ग़ुर्बत
की आहट
सुनो /
जागो !
उठो कर्मवीर !

No comments:

Post a Comment

  क्या ख़ुदा है ??   जो ये कहता है "ख़ुदा है " उस ने देखा ही   नहीं जो ये कहता है "नहीं है" उस ने खोजा भी नहीं ...