मौसमों से
लड़ता नहीं है
पेड़ ,
गालियां नहीं बकता
पागल हवाओं को,
गिरते हुए पत्तों को
निहारता है बस,
रोता नहीं है पेड़ ,
कोई मलाल नहीं
नियति से
न काल से,
सहना और
बने रहना ,
चुप रहना
यही करता है
पेड़ /
अंत तो
मिटटी ही है,
पत्तो का भी,
शाखों का भी
और मौसमों का भी
और पेड़ का भी /
यातना को सहने की
यात्रा है
जीवन ,
और यात्रा है
साधना की
चुप रहने की
सहने की
चलते रहने की/
नर्क में सलीक़े से
जीने की
कला है जीवन /
यातना की
ये यात्रा
मुश्किल है ,
लेकिन
सुकून इस बात का है
की अंत
निश्चित है
इस वेदना का
इस यातना का
और जीवन का
है न ख़ुशी की बात ?
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