भला क्या लेना है मजदूर को लेनिन से
लेकिन मांसखोर मुंह देखता है वहीं
कि खून-पसीने से कमाये चंद सिक्कों के ढेर पर
कैसे मारी जाए ठुंग/
विकास तो मिट्टी देती है
एक दाने पर बैंकों की तरह भीख
जैसे ५% सूद समेत नहीं लौटाती
बल्कि एक दाने के बदले
गरीब की कोठरी भर देती है/
और यही कुदरत
छीनती है जून में गरीब के बदन से नमक
लौटा भी देती है सावन में /
पर तुम्हारी हथेली से पैसा छीनने वाले
शाकाहारी शब्द
तुम्हें भेड़ की तरह छीलते और छांटते हैं
फिर मुस्कराते हुए
उम्मीद की मारी भेड़ों में कंबल बांटते हैं।
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