मैं
संवेदन-शून्य ,
मूढ़ सा
फूटती कोंपलें
झड़ते सूखे पत्तों को
निहार कर भी
विस्मित नहीं होता /
मैं
अपने सामने
मरते पिता को
खुश्क आँखों से निहारता ,
मुखाग्नि देता
अस्थियां चुनता
कितना अभ्यस्त सा लगता हूँ /
महज़ जीने को
ही उपलब्धि
मानता
मूढ़ सा
मैं /
क्या किसी ने मुझे मुझे
सम्मोहित कर
रखा है ?
क्या मैं
किसी स्वप्न में हूँ ?
किसी गहन निद्रा में हूँ ?
ये कैसी
गहन तंद्रा है
काश ! कोई मुझे सिखाता
खिलते फूल को देख कर
मुस्कुराना
और फूटती कोंपलों को देखकर
विस्मित होना
गिरते पत्तों को
किसी कवि की तरह देखना
और मरते पिता को देखकर
काश ! कोई
आँखों को रोना सिखाता /
मैं इस तंद्रा से
जागना चाहता हूँ
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