Monday, 6 May 2024

अमलतास के फूल


अपनी आंखों से बचते –बचाते
मैं तोड़ लाया था
गुज़रे वक़्त की सांवली
शाखों पर से ,
भरी दुपहरी में
झूमर की तरह लहराते
अमलतास के फूलों से
चंद सुनहरी लम्हें /
इन लम्हों को
ज़ूम करके
देख रहा था
मानों कोई कैमरे में क़ैद
तस्वीर हो /
किसी टाइम मशीन में
बैठ के
अपने बीते वक़्त के
गुज़रे हुए,
सोप बब्बल जैसे ,
चमकीले पलों
को किसी बच्चे की तरह
छू कर रोमांचित
हो रहा था /
मैं गुज़रे हुए कल
और आज के मध्य
बने छोटे से स्पेस में
किसी अगरबत्ती से निकलते
धुंए की तरह
बिखर रहा था /
अचानक आंख खुली
तो मैं इस
सपने पर
हँसा और
खिड़की के पास
जाकर बैठ गया ,
बाहर बरामदे में लगे
अमलतास के फूल
किसी शाही महल में
लगे सुनहरी झूमर की तरह
लहरा रहे थे /

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