Monday, 6 May 2024

चहरे टटोलता

 मैं

चहरे टटोलता,
खु़द से ही कुछ बोलता,
चला जा रहा था/

सवालों की गांठें,
ख़यालों के झुरमुट,
मर चुके लम्हें,
बिछड़े कुछ साथी,
वो चहरे, शहर ,नहर,बाग़,वो गली,चौबारे,
किसी की खिलती हँसी,
फूल की तरह महकती /
कुछ अल्हड़ पल
याद के पर्दे पर उभरते
फिर गायब हो जाते/
मै सोचता,
खु़द से ही कुछ बोलता,
चला जा रहा था॥

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